Monday, 26 March 2012

बदल गया हूँ मैं या बदल गए हैं लोग ?

इस  भरी सी दुनिया में कैसा है ये सूनापन ,
दोस्तों बिन अकेला सा लगने लगा है  ये  मन |
बदल  रहा है ये मौसम, बदल रहे हैं लोग ,
दोस्त कहने वाले अब चल पड़े हैं किसी ओर|

याद आते है वो दिन , जब  स्कूल   में दोस्तों से लड़ाई किया करते थे,
और अगले ही दिन मस्ती की एक प्यारी सी झलक  बना दिया करते  थे |
पर  ना जाने कहाँ खो गयी है मस्ती ,
ना जाने कहाँ चली गई  है जिद्द  ,
नज़दीक रह गई है तो बस  उनकी चिडचिडी सी  बातें |
वो कहते थे बदल जाऊँगा मैं ,भूल जाऊँगा मैं ,
पर कुछ ना बदला ,कुछ ना भुला ,
बस बदल गए  हैं तो वो|

ज़िन्दगी में आया है प्यार, लाया है ढेरों नई फुहार |
पर साथ आई है एक मायूसी ,
ना जाने क्यूँ अब ज्यादा हँसने का मन नहीं करता |
मज़ाक  तो दूर की बात है , खिलखिलाने को भी जी नहीं करता |
बस एक ही है मन में सवाल ,
बदल गया हूँ मैं या बदल गए हैं लोग ?

गहरी सोच में डुबो तो औरों की गलती ही नज़र आती है |
पर कहीं ना कहीं मझधार में फंसी हुई नाव में खुदको ही पाता हूँ |
चिढ गया हूँ ,”दोस्त ” नाम  से ,
सोचता हूँ कोई  कैसे इतना बदल सकता है ,
कहलाने वाला सच्चा दोस्त ,
आज तीखी -तीखी बातों से रुलाने को दिल ललचाता है |
कहते हैं बहुत बड़ी है दुनिया ,
पर सच्ची तो ये है कि दिल बहुत छोटा होता है ,
और इस  सपनो भरी दुनिया में कोई किसी का नहीं हो पाता है ।

                                                                                               विकास  द्वारा

Thursday, 15 March 2012

सपने ही सच होते है........................

पापा कहते है सपने मत देखो,सपने सच नहीं होते.वे तो बस दिलासा देते हैं और कुछ नहीं।सपनों की सुनहरी दुनिया होती तो बहुत चमत्कारिक है पर धरातल पर कभी नहीं उतरतीं।सपनों में खोकर रह जाओगे पर हासिल कुछ ना होगा। सपने उन बुलबुलों की भांति होते हैं जिनका कोई भविष्य नहीं होता।
फिर भी मैं सपने देखता हूं।उस भविष्य का सपना जिसकी कल्पना मात्र रोमांचित कर देती है।और देखूं भी क्यों न सपने।
कई सपनो को सच होते देखा-सुना है।इसका जीता जागता उदाहरण है हमारी विश्व कप विजय जिसकी परिकल्पना हर भारतीय पिछ्ले 28 सालों से करता आया था।
हमने हर  क्षेत्र   में झंडॆ गाढे थे पर विश्व विजेता कहलाने का गौरव अभी तक हमसे अछूता ही था।
अखिरकार सपनों के रथ पर सवार,हर बाधा को पारकर हमने उस रावण की लंका जीत ली जिसे कभी राम की वानर सेना ने रौंदा था।
आज से कुछ सत्तर वर्ष पूर्व किसी सत्रह साल के लडक़ॆ ने भी एक सपना देखा था।तब उसे सभी ने यह कहकर दुत्कार दिया था कि वह धरातल की नहीं सोचता।पर वह रुका नहीं और अपनी काल्पनिक दुनिया का सृजन करता गया।उसी काल्पनिक दुनिया को हम आज रिलायंस इंडस्ट्रीज के नाम से जानते हैं।
बता देना चाहता हूं पापा को और आप सब को भी कि मैंने भी अपने लिये एक ऐसी ही काल्पनिक दुनिया की परिकल्पना की है जिसका रचयिता भी मैं ही हूं और जिसका अगुवा भी मैं।
माथे की चन्द लकीरों से इतर भी कुछ रेखायें गढनी शुरु कर दी है मैनें।चीख-चीख कर हिमालय को बता देना चाहता हूं कि उसकी ऊंचाई से मुझे अब डर नहीं लगता।
यम के द्वार पर भी दस्तक दे आया हूं, कि भले ही प्राण चले जाये पर सदैव जीवित रहूंगा मैं,अपने सपनों में,अपनी सोच में ।
                      
                                                                                                                
                                                                                                                        द्वारा- अनुराग

Sunday, 11 March 2012

विद्यार्थियों की मौज मस्ती






हमारे विद्यार्थी कभी कभी अपनी कक्षाओं क़ॆ अतिरिक्त कुछ समय जीवन की अन्य अपेक्षाओं क़ॆ ळिय़ॆ भी निकालते है.ऐसी ही एक गतिविधि ------ सुल्तानपुर बर्ड सेंचुरी की यात्रा

स्वागतम

मित्रों     आप सभी का सी.आई.सी. के रचनात्मक ब्लाग पर स्वागत. यहां आपकों उन विद्द्यार्थियों की रचनात्मकता और क्षमता का परिचय मिलेगा जिन्होने तकनीकी क्षमता के साथ साथ भाषा और मानवीय स्वभाव को समझने की योग्यता को भी अपने भीतर विकसित  करना आरम्भ किया है.रचनात्मकता की इस यात्रा में तकनीक,भाव,भाषा, प्रेम,अनुभूति कलाकारी ,चित्रकारी के साथ साथ दिल्ली विश्व विद्यालय  के क्लस्टर इनोवेशन केन्द्र में चल सही गतिविधियों का परिचय भी आपको समय समय पर मिलता रहेगा.................................. हमारी इस यात्रा में साथी बनिये.