Monday, 19 November 2012

छुपे हुए रहस्य

सदियों की दास्ताँ समेटे
बेमिसाल मगर मौन ये सागर
सबकुछ देखता आया है
कभी उठती कभी गिरती 
फिर भी आगे  बढती
कभी चट्टानों से लडती
अनंत , गहरे पानी में
अपना वजूद ढूढती
बलखाती लहरों को।
ऐसे ही  रोज न जाने कितनी  लहरे
अपना  अस्तित्व पाती  है
और पल में ही खो देती है
हमारी जिन्दगी की तरह ।

Thursday, 13 September 2012

आरक्षण से समाज में समता नहीं आ सकती


विद्यार्थियों की प्रतिभा को दिशा निर्देशित करने का छोटा सा प्रयास

Tuesday, 7 August 2012

संघर्ष

सदियों की दास्ताँ समेटे
बेमिसाल मगर मौन ये सागर
सबकुछ देखता आया है
कभी उठती कभी गिरती 
फिर भी आगे  बढती
कभी चट्टानों से लडती
अनंत , गहरे पानी में
अपना वजूद ढूढती
खुद के ही आगोश में  समाती 
बलखाती लहरों को।
ऐसे ही  रोज न जाने कितनी  लहरे
अपना  अस्तित्व पाती  है
और पल में ही खो देती है
हमारी जिन्दगी की तरह ।

Saturday, 21 July 2012


तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है  सारा आसमाँ ।
लडखडाये क्या कदम तू  गिर गया 
अँधेरा घना था तू उसमे घिर  गया
उठ  जरा ,निकल इन अंधेरों से
अपनी हिम्मत पर यकीन  कर
बढा  दे फिर से रुके कदम
कि तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है सारा  आसमाँ ।
आधा सफ़र  हुआ  तू   खो  गया
जाने किसके सपनों में तू सो गया 
खोल आँखे ,फिर से आ होश  में
दिल मे रख हौसला जीत का
शुरू कर दे फिर अधूरा सफ़र
कि तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है सारा  आसमाँ ।
मंजिल करीब आई तू रुक गया
रिश्तों  के आगे तू झुक गया
तोड़ बंधन ,अपने पर कर  भरोसा 
रिश्तों  की दुनिया से आगे बढ़ 
कि तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है सारा  आसमाँ ।




Friday, 13 July 2012


सुबह - सुबह सूरज की धूप में
रंग  बिरंगे फूलो  से सजे  बागों में
कभी   फूलो  को देखती
कभी कलियों  को हथेलियों  से सहलाती
कभी  तितलियों के   पीछे  भागती
तो कभी सूने आकाश  को  निहारती
वह  अचानक मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
दोपहर  की तपती  धूप  में
पहाड़ो  से बहते झरनों में
निर्मल कल-कल  करते पानी में
अपने तपते बदन को शीतल  करती
कभी डूबती तो कभी उतराती
ठंडे पानी की बूंदों से खेलती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
शाम की  ठंडी छांव में
सहेलियों  से अठखेलिया करती
कभी नाचती तो कभी गाती
कभी हवाओ से बातें  करती
हाथों में हाथ  ले संग  झूले  झूलती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
रात चांदनी की सुकोमल आभा में
दिल की तरह खुले  आँगन  में
माँ के संग बैठकर  बतियाती
छत पर आँख खोले बिछोने पर लेटी
मन में प्रियवर के सपने  संजोती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।



Sunday, 8 July 2012

मेरे दिल को बहुत तडपाती है यादें
आँखों को वक्त-बे वक्त बरसाती है यादें ।
अब तो घर से निकलना भी गुनाह लगता है
राह चलते  वक्त भी सताती  है  यादें ।
कोई है इस जहाँ में,जिसे हम कह सके अपना 
वक्त आने पर यह अहसास दिलाती है यादें ।
अब तो  चाँद सूरज  की जरुरत लगती ही नहीं
 अँधेरे  में रोशनी बन साथ निभाती है यादें ।
दिन में साया बन पीछे पड़ी रहती है वो बातें
बीती बातों की याद दिला रात भर जगाती  है यादें ।

Wednesday, 4 July 2012


वो कहते रहे तुमसे  मेरा कोई रिश्ता नहीं
फिर वो कौन सा बंधन था 
जब भी उनको देखा मै  आँखें अपनी फेर न सका 
और वो मुझे  नजरअंदाज कर न सके ।
कि आज उनके जाते वक्त  मै  मुस्कुरा न सका 
और वो आंसुओ कोबहने से  रोक न सके ।

Monday, 2 July 2012

बहुत खूबसूरत समां ये सुहाना
चलो कोई गीत गुनगुनाते  है हम ।
छेड़े कोई राग  हवाओ  के   संग,
इन्हें,अपने ही सुर से सजाते है हम ।
महक जाये  ये वादियाँ ,ये फिजाये
चलो कोई उपवन लगाते है हम ।
कोई आरज़ू  हो अभी से बता दो
यहीं सपनो का घर बनाते है हम ।
क्या पता कल हम साथ रहे न रहे
चलो आज जी भर के  खुशियाँ मनाते  है हम ।

Saturday, 30 June 2012

डरता हूँ तुम्हारे आसमां से जमीन पर आने से
कही ख़तम न हो जाये अँधेरा मेरे गरीबखाने से।
डर लगता है जब खड़ी  होती हो आईने के सामने
कोई कोई चोर चुरा न ले तस्वीर  तेरी आईने  से।
निकला न करो यू इन अँधेरी रातों में संवरकर
कही हो न जाये सवेरा तेरे रूप के खजाने से ।
छुपा लो चाँद से चेहरे को अपनी रेशमी जुल्फों से
कहीं हो न जाये खता मुझसे ,तुम्हारे पास आने से ।
न हसों इतनी तेज की आवाज पहुँच जाये बादलों तक
कहीं होने न लगे बारिश, तेरे यू  मुस्कराने से  ।

Friday, 29 June 2012

बड़े दिनों बाद  मेरे बागों में कली मुस्काई है 
जरुर वो आज  खिलखिला  के हँसी  होगी ।
रात के अंधेरों में चमकने लगी  है दुनिया
आज वह आँगन में निकल आई  होगी ।
बिन  हवा शाखों के  पत्ते  झूमने   लगे
आज  वह  मस्ती  में   इतराई   होगी  ।
बेचैनी में लहरें कभी उठने तो कभी गिरने लगी
आज उसे किसी अपने की याद आई होगी । 

Wednesday, 27 June 2012

my first poem at CIC.........................

एक खूबसूरत  सा आलम देखने को  जी चाहता है ।
आज फिर गाँव लौट जाने को जी  चाहता है ।
मखमली घास और उन पर ओस की   बूंदें
सूरज की मद्धिम रोशनी और चमचमाती  ये बूंदें
इन्हें हाथों  में ले  चूमने  को  जी  चाहता है
आज फिर गाँव लौट जाने को जी  चाहता है ।
झूमती बलखाती वो सरसों की बलियां
उन पर खिलते नाजुक फूलों की कलियाँ
उन्हें बाहों में ले संग झूमने को जी चाहता है
आज फिर गाँव लौट जाने को जी  चाहता है ।

Friday, 22 June 2012

हसरतें

अभी  न पूछो हमसे , क्या है दिल  में हमारे
अभी बहुत सी हसरते छिपी   है  यहाँ
 आसमां तो बहुत पास  है  हमारे
चाँद तारों से आगे बनानी है दुनिया  ।
न कोई लड़ाई, न कोई झगडा यहाँ 
 न किसी  से गिला न शिकवा होगा
दिलों  में खिलेंगी  मोहब्बत की कलियाँ
प्यार ही  प्यार बरसेगा चारो तरफ
कहलाएगी वो इंसानों की दुनिया
बनायेंगे हम वहां   ऐसा आशियाँ  ।
 न कोई  छोटा न कोई होगा  बड़ा
न कोई अकेला , न कोई होगा पराया
रात   में निडर होकर  नाचेंगी परियां
खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी चारो  तरफ
बहुत खुबसूरत होगी वो हमारी दुनिया
बहुत सुन्दर होगा वो हमारा आशियाँ ।



Thursday, 21 June 2012

                                          जब सुबह  अधखिली धूप में आपकी याद आये
                                           तुम्हारी ये खिलती मुस्कान मेरे मन को हंसा जाये । 
                                          जब दोपहर की बढती तमाजत में मेरा दिल न लगे
                                          हवा का गर्म झोका मेरे तन को तेरा अहसास दिला जाये ।
                                           जब शाम की चुभती ख़ामोशी मुझे तडपाने लगे
                                         चुपके से आपकी आवाज आये और बदन को गुदगुदा जाये ।
                                          जब अकेले तनहा  चांदनी रातों में मुझे नींद न आये
                                          काश कोई मेरे सपनो में आकर मुझे आहिस्ते   से सुला जाये ।

Tuesday, 19 June 2012


आज फलक पर चाँद पूरा निकला तो पूर्णिमा  की याद  आई ।
 आज फिर गाँव  का पीपल चांदनी में  नहाया तो पूर्णिमा  की याद आई।
इंतजार करते  दीपक बुझ से गए थे अंधेरो  में डूबे थे आशियाने 
आज रात  सूने  आँगन को चमकते देखा तो  पूर्णिमा  की याद आई।
 वादियों की खामोशियाँ हवाओ का बिना आवाज किये गुजर जाना
आज परियो की झंकार से  वादियों को झूमते देखा तो पूर्णिमा की याद आई।
 सुबह से चमकता सूरज था और शाम  का सुहाना मौसम 
मगर आधी  रात  होने को आई और  चाँद न निकला तो पूर्णिमा की याद  आई ।

Friday, 15 June 2012

जिन्दगी में इतने सवाल खड़े क्यों  हो गए?
आज हम  इतने बड़े  क्यों  हो गए ?
न रिश्तों के  टूटने का डर  था
न किसी के रूठने का गम था
न कोई अपना, न ही पराया था
अब कितने ही रिश्ते है यहाँ
रोज कोई न कोई रूठ  जाता है यहाँ 
कुछ अपने कुछ पराये क्यों  हो गए
 हम   इतने बड़े  क्यों हो  गए ?
जब मन चाहा  रो लेते थे
जब जी चाहा  हंस लेते  थे
अपनी ही दुनिया,अपनी कहानी थी
अब दूसरों की बातो पर हँसते  है
किसी और के रोने पर रोते है
वो अपने खुशिया,अपनेआंसू कहाँ  खो गए
 आज हम  इतने बड़े क्यों  हो गए ?
आँखों  में चाँद-तारों के सपने  थे
 मन में आकाश छूने की तमन्ना 
अपने ही ख्वाब अपनी ही कहानी  थी
अब सपने मिट   गए आँखो से
तमन्ना,तमन्ना बन के ही रह गयी
 वो कहानी वो  ख्वाब क्यों  खो गए
आज हम  इतने बड़े क्यों  हो गए ?



Thursday, 14 June 2012

मेरे हाथों पर अपना हाथ रख तुमने वादा किया था ।
जिन्दगी भर साथ निभाने का तुमने वादा  किया था ।
चन्द यार क्या हुए , कि  तुम हमें भुला  बैठे 
मुझे  अपने सबसे करीब  रखने का तुमने वादा  किया था ।
बड़े शान -ए -शौकत से जाकर बस गए महलो में
कि तुमने साथ-साथ झोपड़े में रहने का  वादा  किया था ।
हसीं आ जाती है कभी मुझे उन मीठी -मीठी बातों पर 
जब हर वादे को निभाने का तुमने  वादा  किया था ।
तुम किसी भी राह पर जाओ ,मै साथ चलता रहूँगा
मैंने भी हर मोड़ पर साथ निभाने का वादा किया था ।

Tuesday, 12 June 2012

आज  का मौसम बहुत सुहावना था । सुबह से ही बारिश  की फुहारें धरती को नहलाने का प्रयास कर रही थी ।सूरज कभी निकलता तो कभी रूठकर  न जाने कहाँ गायब हो जाता ।हवाओं में पंछियों की मीठी -मीठी आवाजो के घुल -मिल जाने से आस -पास का वातावरण संगीतमय हो गया था ।अचानक मेरे मुह से निकल गया कि "काश ये पल यहीं रुक जाए ।"
लेकिन ये समय ही तो है जो हमारे अनुसार नही चलता ।वह अपनी अविचल गति से आगे बढता रहता है ,बिना किसी की परवाह किये ।
दोपहर हुई ।फिर देखते ही देखते शाम हो गयी ।और एक बार फिर मौसम ने करवट बदली ।धरती को चमकाने वाला सूरज न जाने कहाँ गायब हो गया ।नीले सुनहरे आसमान को डरावने काले बादलों ने ढक लिया ।तेज हवाएं चलने लगी ।और मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी ।तेज हवाएं आंधी में बदल  गयी ।और सुबह का सुहावना मौसम तूफानी मौसम में तब्दील हो गया ।अकस्मात् मेरे दिल ने कहा "काश ये पल जितनी जल्दी हो सके गुजर जाये और फिर लौटकर कभी न आये ।"
अब जरा कुछ  पल रुक कर अपनी  जिन्दगी के बारे में सोचिये ।क्या हमारी जिन्दगी बदलते मौसम सी नहीं है ।कभी -कभी हमें अपने आस -पास के लोग ,वातावरण सब इतना अच्छा लगने लगता है कि हम सोचने लगते हैं कि वक्त यही ठहर जाये और जिन्दगी ऐसे ही हँसते -खेलते गुजर जाये ।लेकिन कभी -कभी हमारी जिन्दगी में कुछ पल ऐसे भी आते है जो हमें दुःख ,पीड़ा ,उदासी से भर जाते हैं और हमें ये कहने को मजबूर कर देते हैं की काश ये पल फिर कभी वापस न आये  ।हम उस पल को अपनी जिन्दगी की किताब से हमेशा के लिए मिटा देना  चाहते हैं ।लेकिन क्या हम सफल हो पाते हैं ?शायद नहीं ।तो क्यों न हम इस बात को स्वीकार कर लें  कि परिवर्तन संसार का नियम है ।ये दुख ,उदासी आंसू ,खुशी, प्यार  सब आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं ।अगर जिन्दगी का लुफ्त उठाना है तो हमें इन सब को साथ लेकर ख़ुशी -ख़ुशी जीना होगा ।
                              किसी के लिए रोना   सजा होता है
                              किसी के लिए हँसना  सजा होता है ।
                              कभी   प्यार  के  मौसम  में
                             किसी को प्यार करना  सजा होता है ।
                            लेकिन यकीन मानिये , हर सजा के पीछे 
                            जिन्दगी का अपना ही  मजा होता है ।

सुबह सूरज की पहली किरण से लेकर शाम के ढलते सूरज की आखिरी किरण तक हमारी जिन्दगी इतनी व्यस्त रहती है की हमें अपने बारे में सोचने का वक़्त ही नहीं मिलता ।ऐसे लगता है जैसे हम जिन्दगी को नहीं जिन्दगी हमें चला रही होती है ।काम ,काम और बस काम ।शाम को थक -हार कर हम घर आते है।रात आने पर हम छत  पर चले जाते है और एकदम अकेले हो जाना चाहते है ।सारी दुनिया से बेखबर ।हम चुपचाप आँख बंद कर लेट जाते है।रात की चांदनी हमें अपने आँचल में ढक लेती है ।चाँद सारी दुनिया को निहारता और अपनी प्रियवर को खोजता आगे बढता रहता है ।तभी  रात की  शीतल  हवा हमारे बदन को छूकर  किसी का एहसास दिला जाती है ।जो हमारे दिल के सबसे करीब  होता है ।और हम उसके सपनो में खोते चले जाते है।और यही से शुरू  होती है पिछली रात की अधूरी  कहानी जो कल रात अधूरी रह गयी थी ।हम उसे अपने पास महसूस करने लगते है, उससे बाते करने लगते है ,वादे  करते है और सुनहरे भविष्य के सपने देखने लगतेहै।  और एक दुसरे में खोते चले जाते हैऔर इसी कसमकस में कब नींद हमें अपने आगोश में समेट लेती है  पता  ही नहीं चलता ।
ऐसे  आलम में बस यही कहने को जी चाहता  है -
रातो का सफ़र अब जारी  हुआ, कोई नहीं है हम-दम मेरा 
तुम बन के मेरी हमसफ़र ,अब तुम मेरे साथ चलो ।
तारे तुझको देख रहे है ,अभी चाँद भी तुझको छेड़ेगा 
छुप कर मेरे सीने में अब तुम मेरे साथ चलो ।
 कुछ वादे किये थे  मिलकर हमने, देखे थे कुछ सपने हमने
पूरा करने उन सपनो वादों को अब तुम मेरे साथ चलो ।
दिन के उजालो में गर हम निकले, देखेगी दुनिया चोर नजर से 
हो के निडर रात की सुन्दर आभा में, अब तुम मेरे साथ चलो ।
रहेंगे जब तक चाँद सितारे कभी ख़तम न होगा अपना सफ़र 
भूल के तुम ये दुनिया सारी अब तुम मेरे साथ चलो ।

Monday, 7 May 2012



चहचहाते पक्षी CIC  के प्रांगण में........................








Friday, 27 April 2012




Prof.Rohlf with the students
















विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई रंगोली














Tuesday, 3 April 2012

अन्धविश्वासी समाज


क्यूँ मम्मी कभी चौराहों के बीच से जाने नहीं देती,
क्यूँ किसी टोक के  कारण रोड बीच से पार करने नहीं देती।
क्यूँ कुछ चाहते हुए भी कुछ कह नहीं पाते,
अपने अन्दर के इंसान को हम जगा ही नहीं पाते।

 क्यूँ पंडितों के मंदिरों के दिए जलाएं,
क्यूँ भूतों के डर से औरों के घर का मीठा ना खाएं,
क्यूँ उस नौली को बंधने से रोक नहीं पाते,
बस एक धागा ही तो है बस!
पर ना जाने क्यूँ कुछ कह ही नहीं पाते,
अपने अन्दर के इंसान को हम जगा ही नहीं पाते।


चलोगे जब तुम इस लीग से हटकर,
कोई तुम्हारा हाथ ना थामेगा
पर तुम बस बढे चलो,
धीरे-धीरे पूरा समाज भी चला आएगा।

Monday, 26 March 2012

बदल गया हूँ मैं या बदल गए हैं लोग ?

इस  भरी सी दुनिया में कैसा है ये सूनापन ,
दोस्तों बिन अकेला सा लगने लगा है  ये  मन |
बदल  रहा है ये मौसम, बदल रहे हैं लोग ,
दोस्त कहने वाले अब चल पड़े हैं किसी ओर|

याद आते है वो दिन , जब  स्कूल   में दोस्तों से लड़ाई किया करते थे,
और अगले ही दिन मस्ती की एक प्यारी सी झलक  बना दिया करते  थे |
पर  ना जाने कहाँ खो गयी है मस्ती ,
ना जाने कहाँ चली गई  है जिद्द  ,
नज़दीक रह गई है तो बस  उनकी चिडचिडी सी  बातें |
वो कहते थे बदल जाऊँगा मैं ,भूल जाऊँगा मैं ,
पर कुछ ना बदला ,कुछ ना भुला ,
बस बदल गए  हैं तो वो|

ज़िन्दगी में आया है प्यार, लाया है ढेरों नई फुहार |
पर साथ आई है एक मायूसी ,
ना जाने क्यूँ अब ज्यादा हँसने का मन नहीं करता |
मज़ाक  तो दूर की बात है , खिलखिलाने को भी जी नहीं करता |
बस एक ही है मन में सवाल ,
बदल गया हूँ मैं या बदल गए हैं लोग ?

गहरी सोच में डुबो तो औरों की गलती ही नज़र आती है |
पर कहीं ना कहीं मझधार में फंसी हुई नाव में खुदको ही पाता हूँ |
चिढ गया हूँ ,”दोस्त ” नाम  से ,
सोचता हूँ कोई  कैसे इतना बदल सकता है ,
कहलाने वाला सच्चा दोस्त ,
आज तीखी -तीखी बातों से रुलाने को दिल ललचाता है |
कहते हैं बहुत बड़ी है दुनिया ,
पर सच्ची तो ये है कि दिल बहुत छोटा होता है ,
और इस  सपनो भरी दुनिया में कोई किसी का नहीं हो पाता है ।

                                                                                               विकास  द्वारा

Thursday, 15 March 2012

सपने ही सच होते है........................

पापा कहते है सपने मत देखो,सपने सच नहीं होते.वे तो बस दिलासा देते हैं और कुछ नहीं।सपनों की सुनहरी दुनिया होती तो बहुत चमत्कारिक है पर धरातल पर कभी नहीं उतरतीं।सपनों में खोकर रह जाओगे पर हासिल कुछ ना होगा। सपने उन बुलबुलों की भांति होते हैं जिनका कोई भविष्य नहीं होता।
फिर भी मैं सपने देखता हूं।उस भविष्य का सपना जिसकी कल्पना मात्र रोमांचित कर देती है।और देखूं भी क्यों न सपने।
कई सपनो को सच होते देखा-सुना है।इसका जीता जागता उदाहरण है हमारी विश्व कप विजय जिसकी परिकल्पना हर भारतीय पिछ्ले 28 सालों से करता आया था।
हमने हर  क्षेत्र   में झंडॆ गाढे थे पर विश्व विजेता कहलाने का गौरव अभी तक हमसे अछूता ही था।
अखिरकार सपनों के रथ पर सवार,हर बाधा को पारकर हमने उस रावण की लंका जीत ली जिसे कभी राम की वानर सेना ने रौंदा था।
आज से कुछ सत्तर वर्ष पूर्व किसी सत्रह साल के लडक़ॆ ने भी एक सपना देखा था।तब उसे सभी ने यह कहकर दुत्कार दिया था कि वह धरातल की नहीं सोचता।पर वह रुका नहीं और अपनी काल्पनिक दुनिया का सृजन करता गया।उसी काल्पनिक दुनिया को हम आज रिलायंस इंडस्ट्रीज के नाम से जानते हैं।
बता देना चाहता हूं पापा को और आप सब को भी कि मैंने भी अपने लिये एक ऐसी ही काल्पनिक दुनिया की परिकल्पना की है जिसका रचयिता भी मैं ही हूं और जिसका अगुवा भी मैं।
माथे की चन्द लकीरों से इतर भी कुछ रेखायें गढनी शुरु कर दी है मैनें।चीख-चीख कर हिमालय को बता देना चाहता हूं कि उसकी ऊंचाई से मुझे अब डर नहीं लगता।
यम के द्वार पर भी दस्तक दे आया हूं, कि भले ही प्राण चले जाये पर सदैव जीवित रहूंगा मैं,अपने सपनों में,अपनी सोच में ।
                      
                                                                                                                
                                                                                                                        द्वारा- अनुराग

Sunday, 11 March 2012

विद्यार्थियों की मौज मस्ती






हमारे विद्यार्थी कभी कभी अपनी कक्षाओं क़ॆ अतिरिक्त कुछ समय जीवन की अन्य अपेक्षाओं क़ॆ ळिय़ॆ भी निकालते है.ऐसी ही एक गतिविधि ------ सुल्तानपुर बर्ड सेंचुरी की यात्रा

स्वागतम

मित्रों     आप सभी का सी.आई.सी. के रचनात्मक ब्लाग पर स्वागत. यहां आपकों उन विद्द्यार्थियों की रचनात्मकता और क्षमता का परिचय मिलेगा जिन्होने तकनीकी क्षमता के साथ साथ भाषा और मानवीय स्वभाव को समझने की योग्यता को भी अपने भीतर विकसित  करना आरम्भ किया है.रचनात्मकता की इस यात्रा में तकनीक,भाव,भाषा, प्रेम,अनुभूति कलाकारी ,चित्रकारी के साथ साथ दिल्ली विश्व विद्यालय  के क्लस्टर इनोवेशन केन्द्र में चल सही गतिविधियों का परिचय भी आपको समय समय पर मिलता रहेगा.................................. हमारी इस यात्रा में साथी बनिये.