इस भरी सी दुनिया में कैसा है ये सूनापन ,
दोस्तों बिन अकेला सा लगने लगा है ये मन |
बदल रहा है ये मौसम, बदल रहे हैं लोग ,
दोस्त कहने वाले अब चल पड़े हैं किसी ओर|
याद आते है वो दिन , जब स्कूल में दोस्तों से लड़ाई किया करते थे,
और अगले ही दिन मस्ती की एक प्यारी सी झलक बना दिया करते
थे |
पर ना जाने कहाँ खो गयी है मस्ती ,
ना जाने कहाँ चली गई है जिद्द ,
नज़दीक रह गई है तो बस उनकी चिडचिडी सी बातें |
वो कहते थे बदल जाऊँगा मैं ,भूल जाऊँगा मैं ,
पर कुछ ना बदला ,कुछ ना भुला ,
बस बदल गए हैं तो वो|
ज़िन्दगी में आया है प्यार,
लाया है ढेरों नई फुहार |
पर साथ आई है एक मायूसी ,
ना जाने क्यूँ अब ज्यादा हँसने का मन नहीं करता |
मज़ाक तो दूर की बात है ,
खिलखिलाने को भी जी नहीं करता |
बस एक ही है मन में सवाल ,
बदल गया हूँ मैं या बदल गए हैं लोग ?
गहरी सोच में डुबो तो औरों की गलती ही नज़र आती है |
पर कहीं ना कहीं मझधार में फंसी हुई नाव में खुदको ही पाता हूँ |
चिढ गया हूँ ,”दोस्त ” नाम से ,
सोचता हूँ कोई कैसे इतना बदल सकता है ,
कहलाने वाला सच्चा दोस्त ,
आज तीखी -तीखी बातों से रुलाने को दिल ललचाता है |
कहते हैं बहुत बड़ी है दुनिया ,
पर सच्ची तो ये है कि दिल बहुत छोटा होता है ,
और इस सपनो भरी दुनिया में कोई किसी का नहीं हो पाता है ।
विकास द्वारा