पापा कहते है सपने मत देखो,सपने सच नहीं होते.वे तो बस दिलासा देते हैं और कुछ नहीं।सपनों की सुनहरी दुनिया होती तो बहुत चमत्कारिक है पर धरातल पर कभी नहीं उतरतीं।सपनों में खोकर रह जाओगे पर हासिल कुछ ना होगा। सपने उन बुलबुलों की भांति होते हैं जिनका कोई भविष्य नहीं होता।
फिर भी मैं सपने देखता हूं।उस भविष्य का सपना जिसकी कल्पना मात्र रोमांचित कर देती है।और देखूं भी क्यों न सपने।
कई सपनो को सच होते देखा-सुना है।इसका जीता जागता उदाहरण है हमारी विश्व कप विजय जिसकी परिकल्पना हर भारतीय पिछ्ले 28 सालों से करता आया था।
हमने हर क्षेत्र में झंडॆ गाढे थे पर विश्व विजेता कहलाने का गौरव अभी तक हमसे अछूता ही था।
अखिरकार सपनों के रथ पर सवार,हर बाधा को पारकर हमने उस रावण की लंका जीत ली जिसे कभी राम की वानर सेना ने रौंदा था।
आज से कुछ सत्तर वर्ष पूर्व किसी सत्रह साल के लडक़ॆ ने भी एक सपना देखा था।तब उसे सभी ने यह कहकर दुत्कार दिया था कि वह धरातल की नहीं सोचता।पर वह रुका नहीं और अपनी काल्पनिक दुनिया का सृजन करता गया।उसी काल्पनिक दुनिया को हम आज रिलायंस इंडस्ट्रीज के नाम से जानते हैं।
बता देना चाहता हूं पापा को और आप सब को भी कि मैंने भी अपने लिये एक ऐसी ही काल्पनिक दुनिया की परिकल्पना की है जिसका रचयिता भी मैं ही हूं और जिसका अगुवा भी मैं।
माथे की चन्द लकीरों से इतर भी कुछ रेखायें गढनी शुरु कर दी है मैनें।चीख-चीख कर हिमालय को बता देना चाहता हूं कि उसकी ऊंचाई से मुझे अब डर नहीं लगता।
यम के द्वार पर भी दस्तक दे आया हूं, कि भले ही प्राण चले जाये पर सदैव जीवित रहूंगा मैं,अपने सपनों में,अपनी सोच में ।
द्वारा- अनुराग
फिर भी मैं सपने देखता हूं।उस भविष्य का सपना जिसकी कल्पना मात्र रोमांचित कर देती है।और देखूं भी क्यों न सपने।
कई सपनो को सच होते देखा-सुना है।इसका जीता जागता उदाहरण है हमारी विश्व कप विजय जिसकी परिकल्पना हर भारतीय पिछ्ले 28 सालों से करता आया था।
हमने हर क्षेत्र में झंडॆ गाढे थे पर विश्व विजेता कहलाने का गौरव अभी तक हमसे अछूता ही था।
अखिरकार सपनों के रथ पर सवार,हर बाधा को पारकर हमने उस रावण की लंका जीत ली जिसे कभी राम की वानर सेना ने रौंदा था।
आज से कुछ सत्तर वर्ष पूर्व किसी सत्रह साल के लडक़ॆ ने भी एक सपना देखा था।तब उसे सभी ने यह कहकर दुत्कार दिया था कि वह धरातल की नहीं सोचता।पर वह रुका नहीं और अपनी काल्पनिक दुनिया का सृजन करता गया।उसी काल्पनिक दुनिया को हम आज रिलायंस इंडस्ट्रीज के नाम से जानते हैं।
बता देना चाहता हूं पापा को और आप सब को भी कि मैंने भी अपने लिये एक ऐसी ही काल्पनिक दुनिया की परिकल्पना की है जिसका रचयिता भी मैं ही हूं और जिसका अगुवा भी मैं।
माथे की चन्द लकीरों से इतर भी कुछ रेखायें गढनी शुरु कर दी है मैनें।चीख-चीख कर हिमालय को बता देना चाहता हूं कि उसकी ऊंचाई से मुझे अब डर नहीं लगता।
यम के द्वार पर भी दस्तक दे आया हूं, कि भले ही प्राण चले जाये पर सदैव जीवित रहूंगा मैं,अपने सपनों में,अपनी सोच में ।
द्वारा- अनुराग