Saturday, 21 July 2012


तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है  सारा आसमाँ ।
लडखडाये क्या कदम तू  गिर गया 
अँधेरा घना था तू उसमे घिर  गया
उठ  जरा ,निकल इन अंधेरों से
अपनी हिम्मत पर यकीन  कर
बढा  दे फिर से रुके कदम
कि तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है सारा  आसमाँ ।
आधा सफ़र  हुआ  तू   खो  गया
जाने किसके सपनों में तू सो गया 
खोल आँखे ,फिर से आ होश  में
दिल मे रख हौसला जीत का
शुरू कर दे फिर अधूरा सफ़र
कि तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है सारा  आसमाँ ।
मंजिल करीब आई तू रुक गया
रिश्तों  के आगे तू झुक गया
तोड़ बंधन ,अपने पर कर  भरोसा 
रिश्तों  की दुनिया से आगे बढ़ 
कि तुझे पाना  है  ये सारा  जहाँ
तुझे जीतना है सारा  आसमाँ ।




Friday, 13 July 2012


सुबह - सुबह सूरज की धूप में
रंग  बिरंगे फूलो  से सजे  बागों में
कभी   फूलो  को देखती
कभी कलियों  को हथेलियों  से सहलाती
कभी  तितलियों के   पीछे  भागती
तो कभी सूने आकाश  को  निहारती
वह  अचानक मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
दोपहर  की तपती  धूप  में
पहाड़ो  से बहते झरनों में
निर्मल कल-कल  करते पानी में
अपने तपते बदन को शीतल  करती
कभी डूबती तो कभी उतराती
ठंडे पानी की बूंदों से खेलती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
शाम की  ठंडी छांव में
सहेलियों  से अठखेलिया करती
कभी नाचती तो कभी गाती
कभी हवाओ से बातें  करती
हाथों में हाथ  ले संग  झूले  झूलती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
रात चांदनी की सुकोमल आभा में
दिल की तरह खुले  आँगन  में
माँ के संग बैठकर  बतियाती
छत पर आँख खोले बिछोने पर लेटी
मन में प्रियवर के सपने  संजोती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।



Sunday, 8 July 2012

मेरे दिल को बहुत तडपाती है यादें
आँखों को वक्त-बे वक्त बरसाती है यादें ।
अब तो घर से निकलना भी गुनाह लगता है
राह चलते  वक्त भी सताती  है  यादें ।
कोई है इस जहाँ में,जिसे हम कह सके अपना 
वक्त आने पर यह अहसास दिलाती है यादें ।
अब तो  चाँद सूरज  की जरुरत लगती ही नहीं
 अँधेरे  में रोशनी बन साथ निभाती है यादें ।
दिन में साया बन पीछे पड़ी रहती है वो बातें
बीती बातों की याद दिला रात भर जगाती  है यादें ।

Wednesday, 4 July 2012


वो कहते रहे तुमसे  मेरा कोई रिश्ता नहीं
फिर वो कौन सा बंधन था 
जब भी उनको देखा मै  आँखें अपनी फेर न सका 
और वो मुझे  नजरअंदाज कर न सके ।
कि आज उनके जाते वक्त  मै  मुस्कुरा न सका 
और वो आंसुओ कोबहने से  रोक न सके ।

Monday, 2 July 2012

बहुत खूबसूरत समां ये सुहाना
चलो कोई गीत गुनगुनाते  है हम ।
छेड़े कोई राग  हवाओ  के   संग,
इन्हें,अपने ही सुर से सजाते है हम ।
महक जाये  ये वादियाँ ,ये फिजाये
चलो कोई उपवन लगाते है हम ।
कोई आरज़ू  हो अभी से बता दो
यहीं सपनो का घर बनाते है हम ।
क्या पता कल हम साथ रहे न रहे
चलो आज जी भर के  खुशियाँ मनाते  है हम ।