सदियों की दास्ताँ समेटे
बेमिसाल मगर मौन ये सागर
सबकुछ देखता आया है
कभी उठती कभी गिरती
फिर भी आगे बढती
कभी चट्टानों से लडती
अनंत , गहरे पानी में
अपना वजूद ढूढती
खुद के ही आगोश में समाती
बलखाती लहरों को।
ऐसे ही रोज न जाने कितनी लहरे
अपना अस्तित्व पाती है
और पल में ही खो देती है
हमारी जिन्दगी की तरह ।
बेमिसाल मगर मौन ये सागर
सबकुछ देखता आया है
कभी उठती कभी गिरती
फिर भी आगे बढती
कभी चट्टानों से लडती
अनंत , गहरे पानी में
अपना वजूद ढूढती
खुद के ही आगोश में समाती
बलखाती लहरों को।
ऐसे ही रोज न जाने कितनी लहरे
अपना अस्तित्व पाती है
और पल में ही खो देती है
हमारी जिन्दगी की तरह ।