Friday, 29 June 2012

बड़े दिनों बाद  मेरे बागों में कली मुस्काई है 
जरुर वो आज  खिलखिला  के हँसी  होगी ।
रात के अंधेरों में चमकने लगी  है दुनिया
आज वह आँगन में निकल आई  होगी ।
बिन  हवा शाखों के  पत्ते  झूमने   लगे
आज  वह  मस्ती  में   इतराई   होगी  ।
बेचैनी में लहरें कभी उठने तो कभी गिरने लगी
आज उसे किसी अपने की याद आई होगी ।