Friday, 13 July 2012


सुबह - सुबह सूरज की धूप में
रंग  बिरंगे फूलो  से सजे  बागों में
कभी   फूलो  को देखती
कभी कलियों  को हथेलियों  से सहलाती
कभी  तितलियों के   पीछे  भागती
तो कभी सूने आकाश  को  निहारती
वह  अचानक मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
दोपहर  की तपती  धूप  में
पहाड़ो  से बहते झरनों में
निर्मल कल-कल  करते पानी में
अपने तपते बदन को शीतल  करती
कभी डूबती तो कभी उतराती
ठंडे पानी की बूंदों से खेलती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
शाम की  ठंडी छांव में
सहेलियों  से अठखेलिया करती
कभी नाचती तो कभी गाती
कभी हवाओ से बातें  करती
हाथों में हाथ  ले संग  झूले  झूलती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।
रात चांदनी की सुकोमल आभा में
दिल की तरह खुले  आँगन  में
माँ के संग बैठकर  बतियाती
छत पर आँख खोले बिछोने पर लेटी
मन में प्रियवर के सपने  संजोती
वह अचानक मुझे  मुझे देख लेती है
और मै ,बस मुस्कुरा के रह जाता  हूँ ।